Himachalblog LogonewsHRTC चक्का जाम: जब सरकार ने अपने ही कमर्चािरयों की पीठ में छुरा घोंपा
24 June 2026 5 mins read

HRTC चक्का जाम: जब सरकार ने अपने ही कमर्चािरयों की पीठ में छुरा घोंपा

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HRTC चक्का जाम: जब सरकार ने अपने ही कमर्चािरयों की पीठ में छुरा घोंपा

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हिमाचल प्रदेश में आज सुबह से HRTC की बसें नहीं चल रहीं। पहाड़ों में फंसे मरीज, स्कूल जाने वाले बच्चे, दफ्तर जाने वाले लोग — सब सड़कों पर खड़े हैं। और इस तबाही का जिम्मेदार कौन है? वही सरकार जो हर चुनाव में “कर्मचारी हितैषी” होने का दावा करती है।

75 महीने! — सात साल से ज़्यादा का हिसाब बाकी है

जरा सोचिए — 75 महीने। छह साल से ज़्यादा। इतने सालों से हिमाचल के HRTC चालकों और परिचालकों को उनका रात का ओवरटाइम भत्ता नहीं मिला। ये वही लोग हैं जो रात के अँधेरे में, टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्तों पर, आपको और आपके परिवार को सुरक्षित घर पहुँचाते हैं। और बदले में उन्हें क्या मिला? 150 करोड़ रुपये का बकाया — जो आज भी सरकारी फाइलों में दब कर पड़ा है।
यह कोई नई बात नहीं। 2016 से वेतन संशोधन का एरियर अटका है। मेडिकल बिलों के 25 से 30 करोड़ रुपये चार साल से लंबित हैं। पेंशनरों को समय पर पेंशन नहीं मिल रही — जून महीने की 22 तारीख तक पेंशन नहीं आई थी। बुजुर्ग रिटायर्ड कर्मचारी, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी इस निगम को दी, वे आज दवाई और राशन के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने पर मजबूर हैं।

सरकार का वादाखिलाफ खेल

सरकार ने बार-बार आश्वासन दिया। बार-बार तारीखें दीं। और बार-बार धोखा दिया।
जब यूनियन ने 24 जून को उप मुख्यमंत्री के साथ बैठक की माँग की — तो डिप्टी CM खुद बैठक में नहीं आए। 12,000 कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को सचिवालय बुलाकर, ऐन वक्त पर एक अतिरिक्त सचिव के हवाले करके वापस भेज दिया। यह बेइज्जती नहीं तो क्या है?
और जब कर्मचारी नाराज होकर पुराने बस अड्डे पर धरने पर बैठे — तो सरकार ने क्या किया? उनकी मांगें सुनने की बजाय यूनियन अध्यक्ष मान सिंह का तबादला चंबा कर दिया। आंदोलन को दबाने की यह नायाब कोशिश बताती है कि सरकार की नीयत क्या है।

ESMA — लोकतंत्र पर ताला

जब बात नहीं बनी, तो सरकार ने अपना असली चेहरा दिखाया। ESMA (आवश्यक सेवाएं अनुरक्षण अधिनियम) लागू कर दिया — अगले 6 महीने के लिए। मतलब साफ है: न हड़ताल करो, न आवाज उठाओ, न अपना हक माँगो।
यह क्या है? यह लोकतंत्र है या तानाशाही? एक तरफ सरकार कर्मचारियों का करोड़ों रुपया दबाकर बैठी है। दूसरी तरफ उन्हें विरोध करने का अधिकार भी छीन लेती है। जो सरकार अपने कर्मचारियों को उनके वैध हक के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर करे, और फिर उन पर ESMA थोप दे — वो सरकार किसके लिए काम कर रही है?

पहाड़ का कर्मचारी — सबसे ज़्यादा बेबस

हिमाचल में HRTC बस सेवा कोई लग्जरी नहीं है। यह जीवनरेखा है। किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा के दूरदराज इलाकों में बसने वाले लोगों के लिए HRTC बस ही एकमात्र सहारा है। जब बस नहीं चलती, तो बच्चा स्कूल नहीं जाता, मरीज अस्पताल नहीं पहुँचता, महिला बाजार नहीं जा पाती।
और जो इन बसों को चलाता है — वो चालक, वो कंडक्टर — उसे प्रति कर्मचारी 50,000 रुपये का एरियर अभी भी नहीं मिला है। उसे वर्दी तक नहीं मिली। वो सुबह 4 बजे उठता है, रात 10 बजे घर लौटता है — और महीने के आखिर में वेतन भी देर से आता है।
यह अन्याय है। और इसके लिए एक ही जिम्मेदार है — हिमाचल प्रदेश सरकार।

सेवानिवृत्त कर्मचारी — आँसू पोंछने वाला भी नहीं

जिन कर्मचारियों ने 30-35 साल निगम की सेवा की, आज उनकी हालत देखी नहीं जाती। पेंशन समय पर नहीं आती। मेडिकल बिल सालों से लटके हैं। हिमाचल परिवहन सेवानिवृत्त कर्मचारी परिषद को भी आंदोलनकारी कर्मचारियों का साथ देना पड़ रहा है — यह खुद इस बात का प्रमाण है कि स्थिति कितनी भयावह है।
बूढ़ा पेंशनर, जिसने अपनी जवानी पहाड़ी रास्तों पर गुज़ारी, वो आज किसी से उधार माँग रहा है — क्योंकि सरकार ने उसकी पेंशन रोक रखी है। क्या यही है “देव भूमि” की सरकार का कर्मचारियों के प्रति रवैया?

अब बहुत हो चुका

HRTC कर्मचारियों का यह आंदोलन कोई अचानक नहीं आया। यह सालों के धैर्य, सालों के इंतज़ार और बार-बार के धोखे का नतीजा है। वे थके हुए हैं — झूठे वादों से, खाली बैठकों से, और एक ऐसी सरकार से जो उनकी बात सुनती है पर सुनती नहीं।
हिमाचल की जनता को यह समझना होगा — आज HRTC कर्मचारी लड़ रहे हैं, कल कोई और विभाग होगा। जब तक सरकार जवाबदेही से नहीं चलती, यह सिलसिला नहीं थमेगा।
सरकार से माँग है:

  1. 2016 से लंबित सभी एरियर का तत्काल भुगतान
  2. 75 महीने का नाइट ओवरटाइम — अभी, बिना देरी के
  3. पेंशनरों को हर महीने समय पर पेंशन
  4. मेडिकल बिलों का पूरा भुगतान
  5. ESMA वापस लो — कर्मचारियों को उनका लोकतांत्रिक अधिकार दो

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